भारतीय रुपया गुरुवार को लगातार तीसरे कारोबारी सत्र में कमजोर हुआ और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.44 रुपये के स्तर पर बंद हुआ। कारोबार के दौरान रुपये में करीब 0.3 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। यह जुलाई के मध्य के बाद रुपये की सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट रही।
रुपये पर सबसे बड़ा दबाव कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से पड़ा। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण ब्रेंट क्रूड 102 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में महंगा कच्चा तेल देश के आयात बिल और डॉलर की मांग को बढ़ाता है, जिसका सीधा असर रुपये पर पड़ता है।
इसके अलावा डेरिवेटिव सौदों की परिपक्वता और कंपनियों की डॉलर हेजिंग से भी अमेरिकी मुद्रा की मांग बढ़ी। बाजार में रुपये को सहारा देने के लिए सरकारी बैंकों द्वारा डॉलर की बिक्री भी देखी गई। वहीं, RBI ने लगातार दूसरे दिन डॉलर-रुपया sell-buy swap का इस्तेमाल किया।
विशेषज्ञों की नजर अब कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया के हालात पर बनी हुई है। यदि तेल की कीमतों में तेजी जारी रहती है तो रुपये और महंगाई पर दबाव बढ़ सकता है।



